
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट – आपके सवालों के जवाब
क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई बच्चा या किशोर अपराध करता है तो उसे कौन सा कोर्ट देखता है? भारत में यह काम जुवेनाइल जेस्तिस एक्ट (JJA) संभालता है। सरल शब्दों में, यह कानून नाबालिगों को आम अदालत से अलग न्याय प्रक्रिया देता है, ताकि उन्हें पुनर्वास का मौका मिले और दण्ड बहुत कठोर ना हो.
मुख्य प्रावधान – क्या हैं खास?
1. **उम्र सीमा**: 18 साल से कम उम्र के सभी मामलों को जुवेनाइल कोर्ट में सुना जाता है. अगर कोई बच्चा 16‑17 वर्ष का है और गंभीर अपराध करता है, तो भी अदालत उसे जुवेनाइल या वयस्क दोनों तौर पर देख सकती है – इसे ‘सेंसिटिविटी टेस्ट’ कहते हैं.
2. **पुनर्वास के उपाय**: जेल की बजाय पुनर्योजना केंद्र (जैसे रेहैबिलिटेशन सेंटर) में भेजा जा सकता है, जहाँ शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण पर जोर दिया जाता है.
3. **गोपनीयता**: जुवेनाइल केस की रिपोर्ट्स सार्वजनिक नहीं होतीं। नाम, फोटो या किसी भी पहचान योग्य जानकारी को मीडिया से बचाया जाता है – इससे बच्चे का भविष्य सुरक्षित रहता है.
हाल के बदलाव और उनका असर
2023 में सरकार ने JJA में कुछ अहम संशोधन किए. अब “नाबालिग अपराधी” की रिहाई पर सशर्त मुक्ति (परोल) का विकल्प जोड़ा गया, जिससे दो साल तक अच्छे व्यवहार वाले बच्चों को जल्दी समाज में वापस लाया जा सके.
साथ ही, ‘ट्रांसजेंडर बच्चे’ के लिए विशेष प्रावधान रखे गए – उन्हें उचित मेडिकल और कानूनी सहायता मिलती है, ताकि उनके अधिकारों की रक्षा हो.
इन बदलावों से कोर्ट को केस जल्दी निपटाने में मदद मिली, और कई बार जेल की भीड़ घट गई. लेकिन कुछ क्षेत्रों में अभी भी लागू करने में दिक्कतें हैं – जैसे छोटे शहरों में रीहैबिलिटेशन सेंटर नहीं होते.
अगर आप या आपका कोई जानकार जुवेनाइल केस का सामना कर रहा है, तो तुरंत एक अनुभवी वकील से मिलें. कई नॉन‑प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन मुफ्त कानूनी सलाह भी देते हैं. याद रखें, समय पर उचित सहायता मिलने से बच्चा सही दिशा में फिर से चलना शुरू कर सकता है.
अंत में, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का मकसद केवल दण्ड देना नहीं, बल्कि नाबालिग को समाज में पुनः स्थापित करना है. इसको समझकर हम सभी मिलकर बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं.
