
बुद्ध पावनिमा – क्या है और क्यों मनाते हैं?
अगर आप कभी सोचते थे कि ‘बुद्ध पावनिमा’ सिर्फ एक दिन की छुट्टी है, तो फिर से सोचना पड़ेगा। यह त्यौहार बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध को याद करने का खास अवसर है। भारत में कई शहरों और गाँवों में लोग इस दिन गाथा सुनते हैं, मंदिर सजाते हैं और शांति के संदेश को आगे बढ़ाते हैं।
बुद्ध पावनिमा आमतौर पर वैषाखी माह की पूर्णिमाओं में आती है, जो अप्रैल‑मैई में पड़ती है। इस तारीख को माना जाता है कि बुद्ध ने 35 वर्ष की उम्र में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था। इसलिए यह दिन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है और इसे ‘बुद्ध जयंती’ भी कहा जाता है।
बुद्ध पावनिमा का महत्व
इस त्योहारी में शांति, दया और सच्चाई के मूल्यों को फिर से याद किया जाता है। बौद्ध मठों में भिक्षु-भिखुणी इस दिन विशेष ध्यान‑सत्र करते हैं, जिससे मन की शुद्धि होती है। घर‑परिवार भी सुबह जल्दी उठकर भगवान बुद्ध के चरणों में फूल और फल चढ़ाते हैं, क्योंकि उन्हें ‘शांति के प्रकाश’ माना जाता है।
भारत के कई राज्यों में इस दिन को सार्वजनिक अवकाश दिया जाता है, खासकर जहाँ बौद्ध जनसंख्या अधिक है – जैसे लद्दाख, महाराष्ट्र (बुधा), कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से। स्कूल‑कॉलेजों में भी बच्चों को बुद्ध की शिक्षाओं के बारे में बताया जाता है, ताकि युवा पीढ़ी शांति के संदेश को अपनाए।
पूजा और समारोह कैसे मनाएँ?
सबसे पहले सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें और हल्का कपड़ा पहनें। फिर निकटतम बौद्ध मंदिर या स्टूपा पर जाएँ। अगर पास में नहीं है, तो घर में एक छोटा मंडप बनाकर उसपर धूप‑दीया लगाएँ। धूप जलाने से मन को शांति मिलती है और यह बुद्ध की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।
फूल (मुख्यतः कमल) और फल (केले, अनार) को थाली में सजाकर भगवान बुद्ध के चरणों में रखें। फिर ‘ध्यान’ या ‘विपासना’ करें – पाँच‑दस मिनट तक श्वास पर ध्यान दें। यह अभ्यास मन को स्थिर करता है और दिन की शुरुआत सकारात्मक बनाता है।
भोजन में हल्का, शाकाहारी भोजन पसंद किया जाता है। कई लोग इस अवसर पर ‘विचीथा’ यानी दान के रूप में गरीबों को खाना देते हैं। अगर आप नहीं दे सकते तो स्थानीय चैरिटी या आश्रम में मदद कर सकते हैं – यह भी बुद्ध की शिक्षा का एक हिस्सा है।
समाप्ति में मंदिर के पुजारियों से सुनें कथा‑सत्र, जहाँ बुद्ध के जीवन की घटनाएँ और उनकी शिक्षाएँ सुनाई जाती हैं। कुछ जगहों पर ‘धर्म संगीत’ या मंत्रोच्चार भी किया जाता है, जिससे माहौल और पवित्र बनता है।
बुद्ध पावनिमा का असली सार शांति और सहिष्णुता में है। इस दिन आप अपने भीतर की आवाज़ सुनें, दूसरों के साथ प्रेम‑भाव रखें और छोटे‑छोटे कामों से बड़े बदलाव लाएँ। यही तो बुद्ध ने सिखाया था – हर छोटी क्रिया बड़ा असर रखती है।
